गुरु चरण वंदना

गुरु समान दाता नहीं, याचक सीष समान।
तीन लोक  की सम्पदा, सो गुरु दिन्ही दान।।

सच है गुरु का समागम, दर्शन, गुरुवाणी और गुरुआज्ञा बड़ी दुर्लभता से मिलती है। लेकिन हमने चिंतामणि के समान अनमोल रत्न को सहज ही प्राप्त कर लिया है। प्रतिभास्थली की पुण्यशाली छात्राओं को भी प्रतिवर्ष परमपूज्य आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज और अभी नवाचार्य श्री समयसागरजी महाराज के दर्शन कर अपने नयनों को तृप्त करने का अवसर मिलता है।

छात्राओं के लिए यह दिन किसी उत्सव से कम नहीं होता है। इस दिन का वे पूरे वर्ष इन्तजार करती हैं। गुरूजी का दर्शन कर जहाँ सभी का मन प्रफुल्लित होता है, वहीँ उनकी पूजा करके सभी का ह्रदय अभिभूत हो जाता है। सभी आचार्य भगवन की आहारचर्या देखकर अपने पुण्य में वृद्धि करते हैं। दोपहर में आचार्य भगवन की अमृतमयी दिव्यध्वनी का पान कर छात्राओं ने धर्म एवं देश के लिए कर्तव्यनिष्ठ नागरिक बनने का संकल्प लिया।

मध्यान्ह के समय में आचार्य भगवन को याद करते हुए प्रतिभास्थली की छात्राओं ने गुरु जी के जीवन के प्रेरक संस्मरण को नाटिका के रूप में प्रस्तुत कर सबको भाव विभोर कर दिया। जिसमें दिखाया गया कि प्राणीमात्र के प्रति उनकी दया, अनुकम्पा और नियमों के प्रति दृढ़ता ने उन्हें कभी साधना के पथ से स्खलित नहीं होने दिया। इस प्रकार की कई प्रस्तुतियां नवीन आचार्य श्री समय सागरजी महाराज के समक्ष हुईं । पूरा दिन गुरु जी की छत्रछाया में रहकर छात्राओं को जो अनुभूति हुई वह कथनीय नहीं है। गुरु का वात्सल्य, करुणामयी दृष्टि और कल्याणकारी आशीर्वाद प्राप्त कर छात्राओं का मन मयूर नाच उठा।

गुरु पूर्णिमा के पावन-पुनीत अवसर पर डोंगरगढ़ में आचार्य भगवन संत शिरोमणि महाश्रमण विद्यासागर जी महामुनिराज के अद्भुततम, दुर्लभ दर्शन का अवसर प्रतिभास्थली की छात्राओं को प्राप्त हुआ। जहां उन्होंनें आचार्य भगवन की वीतराग मुद्रा के दर्शन कर अपने नयनों को तृप्त किया। उनकी दिव्यध्वनि सम दिव्य देशना को श्रवण कर छात्राओं को नवीन दिशाबोध की प्राप्ती हुई। उनके आत्मप्रदेशों का प्रत्यक्ष साक्षात्कार होने से छात्राओं का मन गदगद हो उठा।

गुरुपूर्णिमा पर गुरु आशीष पाने के बाद छात्राएं बीनाबारहा तीर्थक्षेत्र की वन्दना हेतु गयीं। यात्रा के ये क्षण उनके स्मृतिपटल पर दीर्घकाल तक अंकित रहेंगे।